झारखंड: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सारंडा वन के 31,468 हेक्टेयर को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का आदेश

रांची, 13 नवंबर 2025

 

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा वन क्षेत्र के 31,468.25 हेक्टेयर भूमि को वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuary) घोषित करने का राज्य सरकार को कड़ा आदेश दिया है। न्यायालय ने राज्य सरकार के 24,941 हेक्टेयर क्षेत्र को ही अभयारण्य बनाने के प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। यह फैसला वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कोर्ट ने कहा: कोई समझौता नहीं, पूरा क्षेत्र संरक्षित हो

सुप्रीम कोर्ट की ग्रीन बेंच ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के कम क्षेत्र प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और वन्यजीव संस्थान, देहरादून की रिपोर्ट के अनुसार सारंडा एशिया का सबसे बड़ा सल वन क्षेत्र है और इसमें हाथी, बाघ, तेंदुआ सहित कई लुप्तप्राय प्रजातियाँ निवास करती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खनन हितों या अन्य दबावों के चलते संरक्षित क्षेत्र को कम नहीं किया जा सकता।

“वन्यजीव संरक्षण कोई वैकल्पिक नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। राज्य सरकार का 24,941 हेक्टेयर का प्रस्ताव अस्वीकार्य है।”– सुप्रीम कोर्ट

सारंडा वन: जैव विविधता का खजाना

  • क्षेत्रफल: 31,468.25 हेक्टेयर (पूर्ण संरक्षण क्षेत्र)
  • स्थान: पश्चिमी सिंहभूम (झारखंड)
  • विशेषता: एशिया का सबसे बड़ा सल वन, घने जंगल, जल स्रोत
  • वन्यजीव: हाथी, बाघ, तेंदुआ, स्लॉथ भालू, भारतीय विशाल गिलहरी, 200+ पक्षी प्रजातियाँ
  • खतरे: अवैध खनन, माओवादी गतिविधियाँ, वन कटाई

राज्य सरकार का तर्क और कोर्ट की फटकार

झारखंड सरकार ने दलील दी थी कि 6,527 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन पट्टे पहले से स्वीकृत हैं और स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होगी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि खनन कंपनियों को वैकल्पिक क्षेत्र दिए जाएँ और पुनर्वास योजना बनाई जाए। कोर्ट ने 6 माह के अंदर पूरे क्षेत्र को अभयारण्य अधिसूचना जारी करने और संरक्षण योजना लागू करने का आदेश दिया।

पर्यावरणविदों की जीत, आदिवासियों में मिश्रित प्रतिक्रिया

पर्यावरणविदों ने फैसले का स्वागत किया है। वन्यजीव ट्रस्ट ऑफ इंडिया के निदेशक विवेक मेनन ने कहा, “यह बाघ और हाथी कॉरिडोर की रक्षा करेगा। सारंडा सिंहभूम हाथी रिजर्व का हिस्सा है।” हालांकि, स्थानीय हो और मुंडा आदिवासी समुदायों ने चिंता जताई कि अभयारण्य बनने से वन उपज संग्रहण, चराई और परंपरागत खेती पर प्रतिबंध लग सकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदिवासी हितों की रक्षा और वैकल्पिक आजीविका योजना बनाने का भी निर्देश दिया है।

अगला कदम: 6 माह में अधिसूचना, निगरानी समिति गठन

  • समय सीमा: 6 माह में 31,468.25 हेक्टेयर को अभयारण्य घोषित करें
  • निगरानी: NTCA, वन्यजीव संस्थान और कोर्ट नामित विशेषज्ञों की समिति
  • खनन: सभी मौजूदा पट्टों की समीक्षा, वैकल्पिक क्षेत्र आवंटन
  • पुनर्वास: प्रभावित ग्रामवासियों के लिए योजना

यह फैसला वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 और राष्ट्रीय वन नीति को मजबूत करता है। झारखंड में दलमा और पलामू के बाद सारंडा तीसरा बड़ा अभयारण्य बनेगा।

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