मिट गया आदिवासियों का कृष्णपुरी मधु मेला: एक हत्या की वारदात ने समाप्त कर दी 54 साल पुरानी परंपरा

अररिया, बिहार 25 अक्टूबर 2025

दीपावली की रोशनी और छठ की भक्ति के बीच बिहार के अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड में एक ऐसा मेला हुआ करता था, जो आदिवासी समुदाय के लिए साल भर की प्रतीक्षा का प्रतीक था। कालाबलुवा गांव के प्रसिद्ध कृष्णपुरी मधु मेला, जो जंगलों से निकले शहद की मिठास के साथ सांस्कृतिक रंगों से सराबोर होता था, अब केवल यादों और चर्चाओं तक सिमट गया है। 54 साल पुरानी यह परंपरा 2015 में एक क्रूर हत्या की घटना के बाद हमेशा के लिए लुप्त हो गई। आखिरी बार 2016 में एक छोटा सा आयोजन हुआ था, उसके बाद से यह मेला अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है, और स्थानीय आदिवासी समुदाय में उदासी का एक गहरा साया छा गया है।

मेले की धूम और सांस्कृतिक महत्व

रानीगंज प्रखंड मुख्यालय से मात्र 12 किलोमीटर दूर स्थित कालाबलुवा गांव में लगने वाला यह मेला दीपावली के ठीक बाद और छठ पूजा से पहले आयोजित होता था। आदिवासी जनजातीय समुदाय, खासकर संथाल और अन्य मूलवासी समूह, पूरे वर्ष इस मेले का बेसब्री से इंतजार करते थे। मेला केवल व्यापार का केंद्र नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी। यहां जंगलों से एकत्रित शहद (मधु) की बिक्री के साथ-साथ आदिवासी नृत्य, लोकगीत, पारंपरिक व्यंजन और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी होती थी। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह मेला 1970 के दशक से शुरू हुआ था और 54 वर्षों तक निर्बाध चला। “यह हमारी पहचान था। दीपावली की रौनक के बाद छठ की तैयारी के बीच यह मेला हमें अपने पूर्वजों से जोड़ता था। कालाबलुवा के एक वयोवृद्ध आदिवासी नेता रामेश्वर मुर्मू बताते हैं “शहद की मिठास के साथ हम अपनी संस्कृति को जीवंत रखते थे, मेला क्षेत्र में हजारों लोग उमड़ आते थे, जहां स्थानीय कारीगर अपने हस्तशिल्प बेचते और आदिवासी युवा पारंपरिक नृत्यों से समुदाय को एकजुट करते। लेकिन अब, दस वर्ष बीतने को हैं, और मेले की जगह केवल खाली मैदान रह गया है।”

एक हत्या ने बदल दिया सब कुछ

मेले का अंतिम अध्याय 2015 में लिखा गया, जब एक रात की हिंसा ने सब कुछ उजाड़ दिया। मेला आयोजन के दौरान ही कालाबलुवा के एक युवक की क्रूर हत्या कर दी गई। घटना की रात मेले की धूम मची हुई थी, लेकिन अचानक हुई यह वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी। हत्या के कारणों में व्यक्तिगत विवाद या मेले की भीड़भाड़ में हुई झड़प शामिल बताए जाते हैं, लेकिन इसने मेले की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए। हत्या के बाद स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से मेले पर रोक लगा दी। 2016 में आखिरी बार एक सीमित आयोजन हुआ, लेकिन उसके बाद यह परंपरा पूरी तरह समाप्त हो गई। कहते हैं गांव की एक महिला सरपंच प्रतिमा देवी कहती है “उस रात की घटना ने न केवल एक जान ली, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर को भी छीन लिया। अब युवा पीढ़ी केवल कहानियां सुनती है,” पुलिस जांच में हत्या के आरोपी पकड़े गए थे, लेकिन घटना का दंश इतना गहरा था कि समुदाय ने खुद ही मेले को अलविदा कह दिया।

समुदाय में उदासी और पुनरुद्धार की उम्मीद

आजादी के बाद की इस सांस्कृतिक विरासत का लोप आदिवासी समुदाय के लिए अपूरणीय क्षति है। दस वर्षों से अधिक समय से मेला न लगने से स्थानीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है। शहद संग्राहक और हस्तशिल्प कारीगर बेरोजगार महसूस करते हैं। वे कहते हैं “हम पूरे साल जंगल में शहद इकट्ठा करते, लेकिन अब वह बिक्री का कोई मंच नहीं,”। हालांकि, कुछ स्थानीय संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता मेले के पुनरुद्धार की मांग कर रहे हैं। अररिया जिला आदिवासी संघ के अध्यक्ष कहते हैं “सरकारी सहयोग से सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए, तो यह मेला फिर से जीवित हो सकता है। यह हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है,” जिला प्रशासन से भी संपर्क किया जा रहा है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा।  दीपावली और छठ के इस पावन काल में कालाबलुवा के खेतों में सन्नाटा पसरा है, जहां कभी मधु की मिठास और लोक संगीत की धुन गूंजती थी। क्या यह परंपरा कभी लौटेगी? यह सवाल आदिवासी समुदाय के दिलों में कौंध रहा है, लेकिन फिलहाल केवल यादें ही सहारा दे रही हैं।

 

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