बांग्लादेश: शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले छात्र अब मोहम्मद यूनुस सरकार के खिलाफ सड़कों पर

ढाका, 13 नवंबर 2025

 

ढाका से चटगांव, राजशाही तक बांग्लादेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में आक्रोश की लहर दौड़ गई है। नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने इस्लामी कट्टरपंथी समूहों के दबाव में प्राथमिक स्कूलों में संगीत और शारीरिक शिक्षा (PT) शिक्षकों के पदों को रद्द कर दिया है। यह फैसला अगस्त 2025 में जारी ‘सरकारी प्राथमिक स्कूल शिक्षक भर्ती नियम 2025’ में संशोधन के रूप में सामने आया, जिसके बाद छात्रों, शिक्षकों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। आलोचक इसे ‘सांस्कृतिक फासीवाद’ बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे प्रशासनिक कारणों से जोड़ रही है।

इस्लामी समूहों का दबाव: ‘अइस्लामी’ करार देकर सड़क पर उतरने की धमकी

अंतरिम सरकार ने 28 अगस्त 2025 को गजट अधिसूचना जारी कर सामान्य, धार्मिक, संगीत और शारीरिक शिक्षा के लिए सहायक शिक्षकों के पदों की घोषणा की थी। यह कदम बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सराहनीय माना गया था, लेकिन हेफाजत-ए-इस्लाम, जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश और खेलाफत मजलिस जैसे संगठनों ने इसे ‘अइस्लामी’ ठहराते हुए तीखा विरोध किया। इन समूहों ने कहा कि संगीत शिक्षा ‘नास्तिक दर्शन’ से जुड़ी है और इससे बच्चे ‘अनैतिक व अविश्वासी’ हो जाएंगे। सितंबर में जतिया ओलामा मशायेख ऐमा परिषद की रैली में इन संगठनों के नेताओं ने सड़क पर उतरने की धमकी दी, यदि धार्मिक शिक्षकों को प्राथमिकता न दी जाए।

नवंबर को जारी संशोधित परिपत्र में संगीत और पीटी पदों को हटा दिया गया। प्राथमिक एवं जनशिक्षा मंत्रालय के अधिकारी मसूद अख्तर खान ने कहा, “नई नियमों में ये पद शामिल नहीं हैं।” जब इस्लामी दबाव के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने टालते हुए कहा, “आप खुद जांच लें।”

सरकार का दावा है कि 65,000 से अधिक स्कूलों में 10-20 स्कूलों पर एक शिक्षक तैनात करना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन विशेषज्ञ इसे इस्लामी समूहों के आगे झुकने का प्रमाण मानते हैं।

छात्रों का आक्रोश: ‘संस्कृति धर्म के विरुद्ध नहीं’

विरोध की शुरुआत 6 नवंबर को ढाका विश्वविद्यालय से हुई, जहां ‘ओपराजेयो बांग्ला’ मूर्ति के नीचे सैकड़ों छात्रों ने राष्ट्रीय गान और 1971 के मुक्ति संग्राम के गीत गाए। जगन्नाथ विश्वविद्यालय, चटगांव विश्वविद्यालय और राजशाही विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी कैंपस से सड़कों पर उतरकर नारेबाजी की: “संस्कृति कभी धर्म का विरोध नहीं करती!” एक छात्रा ने कहा, “यह फैसला बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष विरासत पर हमला है। रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम के गीतों वाली धरती पर संगीत को हराना अस्वीकार्य है।”

संगीत शिक्षक अजीजुर रहमान तुहिन ने इसे ‘बच्चों की रचनात्मकता का गला घोंटना’ बताया, जबकि सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर #RestoreMusicTeachers अभियान चला रखा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संगीत और खेल बच्चों में सहानुभूति, टीमवर्क और भावनात्मक विकास लाते हैं। कुछ ने इसे तालिबानी विचारधारा से जोड़ा, जहां संगीत पर पूर्ण प्रतिबंध है।

व्यापक संकट: सुधारों पर सवाल, राजनीतिक उथल-पुथल

यह पहला मौका नहीं है जब यूनुस सरकार ने इस्लामी दबाव में झुकी है। पहले महिलाओं के अधिकारों पर प्रस्तावित सुधारों को भी कमजोर किया गया था। आलोचक कहते हैं कि शेख हसीना के पतन (अगस्त 2024) के बाद सत्ता में आई यह सरकार, जो छात्र आंदोलन से जन्मी थी, अब उसी छात्र शक्ति के खिलाफ खड़ी हो गई है। विपक्षी दल बीएनपी ने सरकार पर ‘कट्टरपंथियों के आगे समर्पण’ का आरोप लगाया है।

प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच झड़पें हुईं, जिसमें कई घायल हुए। सरकार ने फरवरी 2026 तक चुनाव का वादा किया है, लेकिन देरी से असंतोष बढ़ रहा है। यदि यह आंदोलन फैला, तो भारत सीमा पर शरणार्थी संकट की आशंका भी है।

यूनुस सरकार के लिए यह परीक्षा है – क्या वह बांग्लादेश की सांस्कृतिक आत्मा को बचाएगी या धार्मिक दबाव में और पीछे हटेगी? देश की नजरें सड़कों पर हैं।

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