ढाका, 18 नवंबर 2025
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए सजा-ए-मौत सुनाए जाने के बाद देश में उग्र प्रदर्शन भड़क उठे हैं। अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (आईसीटी) के इस फैसले ने राजनीतिक तनाव को नया मोड़ दे दिया है, जिसके चलते ढाका सहित कई जिलों में हिंसक झड़पें हुईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनों के दौरान कम से कम 50 लोग घायल हुए हैं, जबकि कुछ स्रोतों ने 2 मौतों की भी पुष्टि की है। सुरक्षा बलों ने आंसू गैस, बैटन और ध्वनि ग्रेनेड का इस्तेमाल कर भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की, लेकिन हालात अब भी काबू से बाहर हैं। बीती रात कई हिस्सों में आगजनी की घटना हुई है और तनाव बरकरार है।
फैसले का पृष्ठभूमि: छात्र आंदोलन का खौफनाक दमन
17 नवंबर 2025 को ढाका के आईसीटी ने शेख हसीना को गैर-हाजिर मुकदमे में दोषी ठहराया। ट्रिब्यूनल ने उन्हें 2024 के जुलाई-अगस्त महीनों में छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर की गई क्रूर कार्रवाई के लिए जिम्मेदार ठहराया। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की गोलीबारी से 1,400 से अधिक लोग मारे गए थे, जबकि हजारों घायल हुए। अभियोजकों ने आरोप लगाया कि हसीना ने हत्याओं को उकसाने, प्रदर्शनकारियों को फांसी देने के आदेश देने और हेलीकॉप्टर व ड्रोन से घातक हमले कराने का निर्देश दिया था।
ट्रिब्यूनल के जज गोलम मोर्तुजा मोजुमदार ने फैसले में कहा, “शेख हसीना ने उकसावे, हत्याओं के आदेश और अत्याचारों को रोकने में नाकामी के तीनों मामलों में दोषी पाई गई हैं।” हसीना के अलावा पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी चार मामलों में मौत की सजा सुनाई गई, जबकि पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्लाह अल-ममुन को राज्य साक्षी बनने पर पांच साल की कैद हुई।
हसीना, जो अगस्त 2024 में सत्ता से अपदस्थ होने के बाद भारत में निर्वासन में हैं, ने फैसले को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “यह एक कठपुतली ट्रिब्यूनल का फैसला है, जो एक गैर-चुनाव वाली सरकार द्वारा नियंत्रित है।” बांग्लादेश सरकार ने भारत से हसीना और कमाल के प्रत्यर्पण की मांग की है, जो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि का हवाला देकर की गई है।
प्रदर्शनों का दौर: आगजनी, झड़पें और मौतें
फैसले के तुरंत बाद ढाका में हसीना के समर्थकों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, कम से कम 50 लोग झड़पों में घायल हुए, जबकि कई जगहों पर वाहनों को आग लगा दी गई। पांच जिलों में आगजनी की घटनाएं दर्ज की गईं, और सुरक्षा बलों को भारी पत्थरबाजी का सामना करना पड़ा।
हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान के ध्वस्त आवास के बाहर सैकड़ों प्रदर्शनकारी जमा हो गए, जहां पुलिस ने साउंड ग्रेनेड और बैटन चार्ज का सहारा लिया। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर वायरल वीडियो में दिखा कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया, जबकि सुरक्षाकर्मी भारी बल प्रयोग कर रहे थे। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि हिंसा में कई लोगों की जान चली गई, हालांकि आधिकारिक आंकड़े अभी स्पष्ट नहीं हैं।
अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने फैसले को “ऐतिहासिक” बताते हुए शांति की अपील की, लेकिन चेतावनी दी कि “अराजकता फैलाने वालों को सख्ती से दबाया जाएगा।” अवामी लीग, जो अब आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित है, के समर्थकों ने मंगलवार को विरोध मार्च बुलाया है, जिससे तनाव और बढ़ सकता है।
राजनीतिक संकट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
यह फैसला बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकता है। हसीना की 15 साल की सत्ता 2024 के “जुलाई क्रांति” से समाप्त हुई थी, जो सरकारी नौकरियों के कोटा सिस्टम के खिलाफ शुरू हुई थी और बाद में भ्रष्टाचार व तानाशाही के खिलाफ व्यापक आंदोलन में बदल गई। यूनुस सरकार ने इसे न्याय का प्रतीक बताया है, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता शिरीन हक जैसे लोग कहते हैं कि “यह सजा पीड़ित परिवारों को सांत्वना नहीं देगी।”भारत ने फैसले को “नोट किया” है और कहा है कि वह बांग्लादेश के लोगों के हित में “रचनात्मक रूप से संलग्न” रहेगा, लेकिन प्रत्यर्पण पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी। हसीना के भारत में रहने से दोनों देशों के रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण हैं। पूर्व मंत्री मोहिबुल हसन चौधरी ने हाल ही में आरटी को दिए इंटरव्यू में दावा किया कि 2024 का तख्तापलट अमेरिकी एजेंसियों और एनजीओ द्वारा प्रायोजित था, जो हसीना की स्वतंत्र विदेश नीति (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध में तटस्थता) से नाराज थे।
देश में आगामी आम चुनावों से पहले यह फैसला अवामी लीग को राजनीतिक रूप से नेस्तनाबूद कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हसीना के प्रत्यर्पण की संभावना कम है, लेकिन यह भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित करेगा। अर्थव्यवस्था, जो पहले से ही संकट में है, पर भी असर पड़ सकता है।बां ग्लादेश के लोग न्याय की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन हिंसा का यह चक्र कब थमेगा, यह सवाल अनुत्तरित है।
