झारखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: PESA कानून की नियमावली 29 साल बाद भी नहीं बनी, सरकार को नोटिस

रांची, 13 नवंबर 2025

 

पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी PESA-1996 की राज्य नियमावली अब तक न बनाने के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ा नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति एस.के. द्विवेदी की एकल पीठ ने सरकार से पूछा है कि जब पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण, शराब दुकानों का लाइसेंस और लघु वन उपज की नीलामी जैसे सभी अधिकार ग्राम सभा को दिए गए हैं, तो ये काम बिना नियमावली के कैसे हो रहे हैं?

कोर्ट के कड़े सवाल

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इन बिंदुओं पर चार हफ्ते में जवाब मांगा है:

शिड्यूल क्षेत्रों में गैर-आदिवासियों को जमीन के पट्टे कैसे दिए जा रहे हैं?

शराब की दुकानों के लाइसेंस बिना ग्राम सभा की सहमति के कैसे जारी हो रहे हैं?

इमली, चार, महुआ, तेंदू पत्ता जैसी लघु वन उपज की नीलामी ग्राम सभा को अधिकार दिए बिना कैसे की जा रही है?

1996 का PESA कानून लागू होने के 29 साल बाद भी झारखंड में इसकी नियमावली क्यों नहीं बनी?

याचिका किसने दायर की?

याचिका आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के संयोजक विक्टर माल्टो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक राय और ज्ञानंत सिंह ने दायर की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि झारखंड में 13 जिले पूर्ण और 2 जिले आंशिक रूप से पांचवीं अनुसूची में आते हैं, लेकिन राज्य सरकार ने जानबूझकर PESA नियमावली नहीं बनाई, ताकि ग्राम सभाओं को अधिकार न मिलें और अफसरशाही-ठेकेदार गठजोड़ चलता रहे।

PESA कानून क्या कहता है?

1996 में संसद द्वारा पारित PESA अधिनियम पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को निम्नलिखित अधिकार देता है:

लघु वन उपज पर स्वामित्व और नीलामी का अधिकार

गांव में शराब दुकान खोलने पर सहमति/असहमति का अधिकार

भूमि अधिग्रहण और गैर-आदिवासियों को पट्टा देने से पहले अनिवार्य सहमति

खनन और लघु खनिज पट्टों पर नियंत्रण

गांव के प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन

झारखंड 15 नवंबर 2000 को अलग राज्य बना, लेकिन आज तक PESA की राज्य नियमावली नहीं बनाई गई। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में यह नियमावली वर्षों पहले बन चुकी है।कोर्ट ने पहले भी दी थी फटकारयह पहली बार नहीं है जब हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। 2015 में कोर्ट ने PESA नियमावली 6 माह में बनाने का आदेश दिया था। 2022 में फिर अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई थी।

इस बार कोर्ट ने कहा, “29 साल हो गए, अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

आदिवासियों में गुस्सा, सरकार पर साजिश का आरोप

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के संयोजक विक्टर माल्टो ने कहा, “PESA न लागू करके सरकार आदिवासी समाज को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर रही है। तेंदू पत्ता, बांस, महुआ की नीलामी से हर साल सैकड़ों करोड़ रुपए ठेकेदार कमाते हैं, जबकि ग्राम सभाओं को एक पैसा नहीं मिलता।”

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