महिलाओं के ‘सम्मान’ के नाम पर नकद राशि: चुनावी हथियार बन चुकी योजनाएं, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बावजूद अप्रैल 2026 के चार राज्यों में सत्ताधारी दलों का पूरा फोकस, जाने कितने राज्यों में है लागू

सुरेन्द्र सोरेन, 30 मार्च 2026

 

भारतीय राजनीति में एक नया ट्रेंड तेजी से फैल रहा है — महिलाओं को सम्मान, बहन, लाड़ली या महिला जैसे भावनात्मक नामों से सीधे बैंक खाते में नकद राशि ट्रांसफर करने की योजनाएं। ये योजनाएं अब चुनाव जीतने की सबसे बड़ी ‘गारंटी’ बन चुकी हैं। सिर्फ पांच साल में देश के 15 राज्यों में ये योजनाएं लागू हो चुकी हैं, जहां लगभग 13 करोड़ महिलाओं को हर महीने ₹1,000 से ₹2,500 तक की राशि मिल रही है। सालाना खर्च ₹2.46 लाख करोड़ पहुंच गया है, जो तीन साल पहले महज ₹1,600 करोड़ था।

ये योजनाएं राजनीतिक दलों के लिए ‘वोट बैंक’ की तरह काम कर रही हैं। महिलाओं के नाम पर सीधा कैश देने से घर-घर में संदेश पहुंचता है, खर्च का पैटर्न बदलता है और सबसे महत्वपूर्ण — मतदान के दिन वोट मिल जाता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में इन ‘फ्रीबीज’ पर सख्त टिप्पणी की है। फिर भी अप्रैल 2026 में होने वाले चार प्रमुख राज्यों (असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल) के सत्ताधारी दल इन योजनाओं को और मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं।

15 राज्यों में ‘सम्मान’ की योजनाएं: नाम, राशि और फैलाव

2022-23 में सिर्फ दो राज्य (केरल और तमिलनाडु) ऐसी योजनाएं चला रहे थे। अब यह संख्या 12-15 राज्यों तक पहुंच गई है। PRS Legislative Research की रिपोर्ट के अनुसार 12 राज्यों में 2025-26 के लिए कुल ₹1.68 लाख करोड़ का प्रावधान है। वर्तमान रिपोर्ट इसे 15 राज्यों तक बताती है।

कुछ प्रमुख योजनाएं:

  • मध्य प्रदेश — लाड़ली बहना योजना (₹1,000 से बढ़कर ₹1,500 प्रति माह)
  • तमिलनाडु — कलाइग्नर मगलिर उरिमै थोगै थिट्टम (₹1,000 प्रति माह)
  • कर्नाटक — गृह लक्ष्मी योजना (₹1,000-₹1,500)
  • महाराष्ट्र — मुख्यमंत्री लाड़की बहिन योजना (₹1,500, बाद में कुछ कटौती)
  • झारखंड — मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना (₹2,500 प्रति माह — 2024 में दोगुना किया गया)
  • पश्चिम बंगाल — लक्ष्मीर भंडार (SC/ST महिलाओं को ₹1,700, अन्य को बढ़ाकर ₹1,500)
  • बिहार — माई बहन मान या जीविका दीदी (वार्षिक ₹30,000)
  • असम — ओरुनोदोई + अन्य (संभावित ₹3,750 तक मासिक)
  • केरल — मुख्यमंत्री स्त्री सुरक्षा योजना (₹1,000 प्रति माह)
  • अन्य राज्य: तेलंगाना, दिल्ली (₹2,500 वादा), आंध्र प्रदेश, ओडिशा (सुभद्रा) आदि।

ये योजनाएं ज्यादातर 18-60 साल की महिलाओं, विशेषकर गरीब, SC/ST या आय सीमा वाली परिवारों को लक्षित करती हैं। पैसा सीधे आधार लिंक्ड बैंक खाते में जाता है — महिलाओं के फोन पर अलर्ट आता है, जो भावनात्मक रूप से उन्हें सशक्त महसूस कराता है।

चुनावी गारंटी क्यों बन गई?

ये योजनाएं अब ‘चुनावी हथियार’ का दर्जा पा चुकी हैं। मध्य प्रदेश (2023), राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इन योजनाओं ने महिलाओं के वोट को झुकाया। महिलाएं अब ‘बीजेपी की बहन’ या ‘डीएमके की बहन’ जैसी पहचान महसूस करती हैं। राजनीतिक दल इसे ‘आर्म्स रेस’ की तरह अपनाते जा रहे हैं — जो भी सत्ता में है, वो बढ़ाता है; विपक्ष वादा करता है।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये राशि महिलाओं की मासिक आय का 11-87% तक हो सकती है। खर्च मुख्यतः खाने (43-78%), स्वास्थ्य, बच्चों की पढ़ाई और एलपीजी पर होता है। इससे परिवार की स्थिति सुधरती है, लेकिन लंबे समय में राज्य के बजट पर बोझ बढ़ता है। कई राज्यों में यह खर्च जीएसडीपी का 2-3% पहुंच गया है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘फ्रीबी कल्चर’ पर जमकर हमला बोला। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस बीआर गवई ने योजनाओँ के बारे में कई महत्वपूर्ण टिप्पणी की है:

  • “चुनाव से ठीक पहले ऐसी योजनाएं क्यों घोषित होती हैं?”
  • “क्या हम पूरे देश में एक ‘परजीवी वर्ग’ (class of parasites) तैयार कर रहे हैं?”
  • “फ्री बिजली, फ्री खाना, कैश ट्रांसफर… विकास के पैसे कहां से आएंगे?”
  • “ये राष्ट्र-निर्माण में बाधा हैं, काम करने की संस्कृति को कमजोर करती हैं।”

कोर्ट ने माना कि गरीबों के लिए लक्षित कल्याण ठीक है, लेकिन बिना भेदभाव के ‘लार्जेस’ (बड़ी-बड़ी सौगातें) राज्य की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रही हैं। कई राज्यों में राजस्व घाटा है, फिर भी ये योजनाएं बढ़ाई जा रही हैं।

अप्रैल 2026 के चार राज्यों में सत्ताधारी दलों का फोकस

चुनाव आयोग ने मार्च 2026 में घोषणा की — अप्रैल 2026 में असम (9 अप्रैल), केरल (9 अप्रैल), तमिलनाडु (23 अप्रैल) और पश्चिम बंगाल (23-29 अप्रैल, दो चरण) में विधानसभा चुनाव। (पुदुचेरी भी साथ में।)सत्ताधारी दलों की रणनीति:

  • पश्चिम बंगाल (टीएमसी) — लक्ष्मीर भंडार में ₹500 मासिक बढ़ोतरी (2026-27 बजट)। SC/ST महिलाओं को अब ₹1,700।
  • केरल (एलडीएफ) — दिसंबर 2025 में शुरू हुई मुख्यमंत्री स्त्री सुरक्षा योजना के लिए ₹3,720 करोड़ आवंटित, ₹1,000 मासिक।
  • असम (बीजेपी) — ओरुनोदोई जैसी योजनाओं को और मजबूत करने की तैयारी।
  • तमिलनाडु (डीएमके) — कलाइग्नर मगलिर योजना को और आकर्षक बनाने पर फोकस।

ये राज्य पहले से ही घाटे में हैं, लेकिन सत्ताधारी दल जानते हैं कि महिलाओं का वोट तय करेगा।

सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव

सकारात्मक: महिलाओं की घरेलू सौदेबाजी बढ़ी है। खर्च शिक्षा और स्वास्थ्य पर हो रहा है। कई अध्ययनों में पाया गया कि छोटी राशि भी महिलाओं को आत्मनिर्भर महसूस कराती है।

नकारात्मक: 12 में से 6 राज्यों में राजस्व घाटा है। अगर योजनाएं हटा दें तो घाटा कम हो जाता है। विकास कार्यों (सड़क, अस्पताल, शिक्षा) के लिए पैसा कम पड़ रहा है। अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि ये अल्पकालिक लोकप्रियता लंबे समय में राज्य को कर्ज के बोझ तले दबा सकती हैं।

अंत में: विकास बनाम लोकलुभावनवाद

महिलाओं को सम्मान देने का नाम लेकर चलाई जा रही ये योजनाएं वाकई सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती हैं, लेकिन जब इन्हें चुनावी हथियार बना लिया जाए तो सवाल उठता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है — “क्या हम राष्ट्र-निर्माण में बाधा बन रहे हैं?” अप्रैल 2026 के चुनाव इस सवाल का जवाब देंगे। क्या सत्ताधारी दल फ्रीबीज की बजाय रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस करेंगे, या ‘कैश इन अकाउंट’ ही सबसे बड़ा वोट-बैंक बनेगा? ये योजनाएं महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान ला रही हैं, लेकिन राज्य के भविष्य पर सवालिया निशान भी लगा रही हैं। समय बताएगा कि ये ‘सम्मान’ स्थायी सशक्तिकरण है या सिर्फ चुनावी ‘सम्मान’।

 

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