सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के धर्मांतरण विरोधी कानून पर उठाए सवाल, कहा- धर्म परिवर्तन की राह में बाधाएं डाल रहा है विधान

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2025

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के विवादास्पद धर्मांतरण विरोधी कानून की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि यह कानून धर्म परिवर्तन करने की इच्छा रखने वाले व्यक्तियों के लिए एक “भारी प्रक्रिया” (onerous procedure) थोप रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता प्रतीत होता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश होने के बावजूद, इस कानून से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता पर अनावश्यक हस्तक्षेप हो रहा है। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जहां कई एफआईआर रद्द की गईं।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे, ने उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन एक्ट, 2021 (यूपी धर्मांतरण विरोधी कानून) की कुछ धाराओं पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि कानून में धर्म परिवर्तन के लिए जिला मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति लेने, एक माह पहले घोषणा करने और परिवर्तित व्यक्ति की जानकारी सार्वजनिक करने जैसी शर्तें व्यक्ति की निजता और स्वायत्तता का हनन करती हैं। बेंच ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विवाह और धर्म चुनाव जैसे निजी मामलों में राज्य का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।

यह टिप्पणी प्रयागराज के सम हिगिनबॉटम यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज (एसएचयूएटीएस) के वाइस चांसलर राजेंद्र बिहारी लाल और अन्य अधिकारियों के खिलाफ दर्ज छह एफआईआर से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान आई। ये एफआईआर फतेहपुर जिले में कथित “मास रिलिजियस कन्वर्जन” (हिंदुओं का ईसाई धर्म में सामूहिक परिवर्तन) के आरोपों पर दर्ज की गई थीं। अदालत ने पांच एफआईआर रद्द कर दीं, क्योंकि शिकायतें गलत प्रक्रिया से दर्ज की गई थीं और कोई पीड़ित व्यक्ति पुलिस के पास नहीं पहुंचा था। एक मामला अलग रखा गया, जिसमें गिरफ्तारी पर अंतरिम संरक्षण जारी रहेगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला कानून की संवैधानिक वैधता पर सीधा निर्णय नहीं है, लेकिन प्रावधानों की समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, “अपराधी कानून निर्दोषों को उत्पीड़ित करने का उपकरण नहीं बन सकता।” बेंच ने शफीन जहां बनाम असोकन के.एम. (2018) मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि धर्म चुनने का अधिकार मौलिक है।

कानून का पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश विधानसभा ने 2020 में यह विधेयक पारित किया, जो “लव जिहाद” और जबरन धर्मांतरण को रोकने का दावा करता है। कानून में जबरन, धोखे से या विवाह के बहाने परिवर्तन पर 10 वर्ष तक की सजा और जुर्माना है। 2024 में संशोधन से यह और सख्त हो गया, जिसमें महिलाओं को “कमजोर” मानकर अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए। वकील एस. मुराजीदहर की याचिका में कहा गया कि धारा 5 अस्पष्ट है और महिलाओं की स्वायत्तता का अपमान करती है।

वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेएपी) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसी संस्थाओं की याचिकाएं लंबित हैं, जो उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों (मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात आदि) के इसी तरह के कानूनों को चुनौती दे रही हैं। जुलाई 2025 में अदालत ने संशोधित प्रावधानों पर अमल रोकने का आदेश दिया था।

कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले को “मील का पत्थर” बताया। लखनऊ के वरिष्ठ वकील एस. मोहम्मद हैदर रिजवी ने कहा, “यह फैसला अल्पसंख्यकों के खिलाफ दुरुपयोग को रोकने में मददगार होगा।” पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने जोर दिया कि धर्म का अधिकार प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता, लेकिन विनियमित हो सकता है।उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून को “सुरक्षा का उपकरण” बताया, लेकिन अदालत के निर्देशों का पालन करने की बात कही। विपक्षी दलों ने स्वागत किया, जबकि भाजपा ने कहा कि यह जबरन परिवर्तन रोकने के लिए जरूरी है। मानवाधिकार संगठनों ने मांग की कि लंबित याचिकाओं पर जल्द सुनवाई हो। यह फैसला न केवल यूपी बल्कि अन्य राज्यों के समान कानूनों पर असर डालेगा। अदालत ने अगली सुनवाई अगस्त 2025 के लिए निर्धारित की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करेगा और कानूनों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाएगा।

 

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