बोआरीजोर (गोड्डा), 14 जनवरी 2026
झारखंड के गोड्डा जिले के बोआरीजोर गांव में संताल आदिवासियों का प्रमुख त्योहार सकरात पर्व बहुत धूमधाम, हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है और संताल समुदाय में वर्ष का अंतिम दिन भी कहा जाता है।

तीरंदाजी में ताला सोरेन ने लगाया निशाना, बने विजेता
धार्मिक परंपरा के अनुसार, आज के मुख्य आयोजन बेझातुंज में सबसे पहले जोगमांझी नारायण बेसरा ने तीर चलाकर शुरुआत की। इसके बाद प्रवासी भारतीय डॉ. धुनि सोरेन ने तीर चलाया। फिर सभी ग्रामीणों ने भाग लिया, जिसमें ताला सोरेन ने निशाना साधने में सफलता हासिल की। उन्हें सम्मानस्वरूप कंधों पर उठाकर गांव में घुमाया गया। इसके बाद महिलाओं और पुरुषों ने पारंपरिक नाच-गान किया। डॉ. धुनि सोरेन ने मौके पर सभी ग्रामीणों से आग्रह किया कि वे सप्ताहिक मंझी थान पूजा जरूर करें और अपनी सभ्यता व संस्कृति को संरक्षित रखें।

सकरात पर्व दो दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन को हाकु काटकोम माह कहा जाता है, जिसमें लोग जील पीठह (मांस लगा रोटी), मांस, मछली, सुनुम पीठह और विभिन्न सब्जियां खाते हैं। दूसरे दिन सुबह नहा-धोकर घर में पूर्वजों, मारंग बुरु आदि ईष्ट देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का नाम लेकर गुड़, चुड़ा, सुनुम पीठह आदि भोग चढ़ाया जाता है। इस दिन नए बर्तन और नए चूल्हे पर खाना बनाने की प्रथा है।

इसके बाद लोग शिकार के लिए पहाड़, जंगल और खेत-खलिहान जाते हैं, जिसे सेंदरा कहते हैं। सेंदरा से लौटने पर बेझातुंज किया जाता है, जिसमें केला या अंडी के पेड़ के टुकड़े को पूर्व दिशा में जमीन में गाड़ा जाता है और पश्चिम से तीर से निशाना लगाया जाता है। सफल निशानेबाज को सम्मानित किया जाता है। फिर टुकड़े को पांच बराबर हिस्सों में काटकर एल नुमा बनाया जाता है और नाचते-गाते हुए गांव के लेखा होड़ (गांव की व्यवस्था चलाने वाले लोग) के घर ले जाया जाता है। ये टुकड़े मंझी बाबा, गुडित, जोग मंझी, प्राणिक और नायकी के घर के छप्पर में रखे जाते हैं।

इस पावन अवसर पर संजलह सोरेन, मुशी सोरेन, तलु मुर्मू, बुधराम मुर्मू, बबलू मराण्डी, रोजमेरी मरांडी, अनिल मरांडी, सनिराम मुर्मू, नटुलाल सोरेन सहित बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और बच्चे उपस्थित रहे।सकरात पर्व संताल आदिवासियों की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने और सामुदायिक एकता को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यह त्योहार प्रकृति, पूर्वजों और सामूहिक जीवन मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
