नई दिल्ली, 17 फरवरी 2026
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने 16 फरवरी 2026 को संस्कृति मंत्रालय द्वारा नई दिल्ली में आयोजित ओल चिकी लिपि शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने ओल चिकी लिपि को संथाली समुदाय की पहचान का एक शक्तिशाली और वैश्विक प्रतीक बताया। इस अवसर पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि संथाल समुदाय की अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति है। हालांकि, अपनी लिपि के अभाव में, संथाली भाषा को प्रारंभ में रोमन, देवनागरी, उड़िया और बंगाली लिपियों में लिखा जाता था। नेपाल, भूटान और मॉरीशस में रहने वाले संथाल समुदाय के सदस्य भी उन देशों में प्रचलित लिपियों में ही लिखते थे। ये लिपियाँ संथाली भाषा के मूल शब्दों का सही उच्चारण करने में सक्षम नहीं थीं। 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया। तब से इसका उपयोग संथाली भाषा के लिए किया जाता है। अब, यह लिपि विश्व स्तर पर संथाल पहचान का एक सशक्त प्रतीक है। यह संथाल समुदाय के बीच एकता स्थापित करने का एक प्रभावी साधन भी है।राष्ट्रपति ने कहा कि ओल चिकी लिपि की शताब्दी समारोह को इस लिपि को बढ़ावा देने का संकल्प लेने का अवसर होना चाहिए। बच्चे हिंदी, अंग्रेजी, उड़िया और बंगाली या किसी अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मातृभाषा संथाली को भी ओल चिकी लिपि में सीखना चाहिए।

राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि महान विद्वान पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा 1925 में निर्मित यह लिपि न केवल संताल पहचान का वैश्विक प्रतीक है, बल्कि समुदाय में एकता स्थापित करने का भी सशक्त माध्यम है। उन्होंने इस शताब्दी पुरानी लिपि के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और डिजिटल माध्यमों में इसके विस्तार के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।समारोह में राष्ट्रपति ने ओल चिकी लिपि की शताब्दी पूर्ण होने पर एक स्मारक सिक्का और डाक टिकट भी जारी किया। कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जनजातीय कार्य मंत्री जुअल ओराम सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने ओल चिकी लिपि के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया। उन्होंने संथाली समुदाय के 10 ऐसे व्यक्तियों को भी सम्मानित किया जिन्होंने संथाली लोगों के बीच ओल चिकी लिपि के व्यापक उपयोग को बढ़ावा दिया है।

यह आयोजन संथाली भाषा और जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत की भाषाई विविधता को मजबूत करता है।
