पालघर, 23 जनवरी 2026
महाराष्ट्र के पालघर जिले में पिछले कुछ दिनों से एक बड़ा जन आंदोलन देखने को मिल रहा है। अनुमानित 50 हजार से अधिक आदिवासी, किसान, मजदूर और मछुआरे अपने संवैधानिक हक़, भूमि अधिकारों और आजीविका की रक्षा के लिए पैदल मार्च (लॉन्ग मार्च) कर रहे हैं। यह मार्च 19 जनवरी 2026 को दहानू तहसील के चारोटी नाका से शुरू हुआ और पालघर जिला कलेक्टर कार्यालय की ओर बढ़ा, जहां प्रदर्शनकारियों ने अनिश्चितकालीन धरना दिया।
यह आंदोलन मुख्य रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम), अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS), राष्ट्रीय आदिवासी अधिकार मंच और अन्य जन संगठनों के नेतृत्व में चल रहा है। प्रमुख नेताओं में डॉ. अशोक धवले, विधायक विनोद निकोले, डॉ. अजीत नवले और अन्य शामिल हैं। प्रदर्शनकारी लाल झंडे, नारे और गीतों के साथ करीब 50-60 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर रहे हैं, जो उनकी एकजुटता और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
प्रमुख मांगें क्या हैं?
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी समस्याओं से जुड़ी हुई हैं। इनमें शामिल हैं:
- वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 की पूर्ण और प्रभावी अंमलबजारी, जिसमें व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि अधिकारों को मान्यता दी जाए।
- पेसा (PESA) कानून को सख्ती से लागू करना, ताकि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को वास्तविक अधिकार मिलें।
- वाढवण (Vadhavan) और मुरबे बंदरगाह जैसी बड़ी बंदरगाह परियोजनाओं को रद्द करना, क्योंकि इनसे हजारों मछुआरों और आदिवासियों की आजीविका छिन जाएगी और पर्यावरण को भारी नुकसान होगा।
- मनरेगा (MGNREGA) योजना को बहाल करना और ग्रामीण रोजगार गारंटी सुनिश्चित करना।
- स्मार्ट मीटर योजना वापस लेना, श्रम संहिताओं को रद्द करना।
- पीने के पानी, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन और सरकारी नौकरियों में रिक्त पदों को भरना।
- मंदिरों, इनाम और सरकारी भूमि पर खेती करने वालों को पट्टा प्रदान करना।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन को मुंबई की ओर विस्तारित किया जाएगा। पुलिस ने कुछ स्थानों पर मार्च को रोका, जिससे तनाव बढ़ा, लेकिन प्रदर्शन शांतिपूर्ण बना रहा।
प्रशासन की प्रतिक्रिया और अपडेट
पालघर प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की और कुछ स्थानीय मांगों (जैसे FRA दावों का निपटारा 30 अप्रैल 2026 तक) पर लिखित आश्वासन दिया, जिसके बाद धरना स्थगित हुआ। हालांकि, राज्य स्तरीय मांगों पर आंदोलन जारी रहने की घोषणा की गई है।
यह मार्च न केवल पालघर बल्कि पूरे महाराष्ट्र के आदिवासी और किसान समुदायों की एकजुट आवाज बन गया है। कई सामाजिक कार्यकर्ता इसे “जंगल, जमीन और जल” की लड़ाई बता रहे हैं, जबकि आलोचक मुख्यधारा मीडिया की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।
