नई दिल्ली, 5 मार्च 2026
अमेरिका और इज़राइल के साथ ईरान के बीच जारी युद्ध आज छठे दिन में प्रवेश कर गया है, जबकि भारत ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम उठाते हुए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर पहली बार आधिकारिक शोक संवेदना व्यक्त की है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने आज नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास पहुंचकर खामेनेई के निधन पर कंडोलेंस बुक पर हस्ताक्षर किए और श्रद्धांजलि अर्पित की।
यह घटना तब हुई जब खामेनेई की मौत को 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी या इसी तरह के नाम से) में उनकी टिहरीन कंपाउंड पर हमले में हुई पुष्टि हुई थी। ईरान ने एक दिन बाद (1 मार्च) इसकी आधिकारिक घोषणा की थी। खामेनेई, जो 1989 से ईरान के सुप्रीम लीडर थे और 86 वर्ष के थे, उनकी मौत ने मध्य पूर्व में बड़े बदलाव की शुरुआत की है।
युद्ध की ताजा स्थिति (छठा दिन)
- युद्ध अब छठे दिन में है, जिसमें अमेरिका-इज़राइल ने ईरान के मिसाइल नेटवर्क, न्यूक्लियर साइट्स और सैन्य ठिकानों पर लगातार हमले तेज कर दिए हैं।
- ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट गहरा गया है और कुछ जहाजों को निशाना बनाया गया।
- ईरान में आंतरिक अशांति बढ़ी है—कुछ शहरों में खामेनेई की मौत पर जश्न मनाया जा रहा है, जबकि समर्थक सड़कों पर विरोध और बदले की मांग कर रहे हैं।
- ईरान ने 40 दिनों का शोक घोषित किया है, लेकिन अंतिम संस्कार में देरी हो रही है। इज़राइल ने उत्तराधिकारी को भी निशाना बनाने की धमकी दी है।
भारत का रुख और महत्व
भारत ने अब तक अमेरिका-इज़राइल हमलों की निंदा नहीं की थी, लेकिन आज विदेश सचिव विक्रम मिसरी का ईरानी दूतावास जाना पहला आधिकारिक शोक संदेश माना जा रहा है। यह कदम भारत की “संतुलित विदेश नीति” को दर्शाता है, जहां वह ईरान के साथ मजबूत आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध रखता है (चाबहार पोर्ट, तेल आयात आदि)। भारत ने युद्ध में “संयम और कूटनीति” की अपील की है, लेकिन अब शोक जताकर ईरान के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है।
दुनिया भर से खामेनेई की मौत पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आ रही हैं—कई पश्चिमी देशों ने इसे “क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सकारात्मक” बताया, जबकि मुस्लिम देशों और ईरान समर्थकों में शोक और गुस्सा है। भारत में भी शिया समुदाय ने विभिन्न जगहों पर शोक सभाएं की हैं।
यह युद्ध मध्य पूर्व की राजनीति को हमेशा के लिए बदल सकता है, और भारत जैसे देशों की भूमिका अब और अहम हो गई है। स्थिति तेजी से बदल रही है—आने वाले दिनों में और बड़े घटनाक्रम की उम्मीद है।
