असम में टी-ट्राइब्स को ऐतिहासिक मालिकाना हक: आज से शुरू हुई जमीन आवंटन प्रक्रिया, 103 चाय बागानों में फॉर्म वितरण

दिब्रूगढ़/गुवाहाटी, 10 फरवरी 2026

 

असम सरकार ने चाय बागानों में सदियों से रह रहे टी-ट्राइब्स (चाय जनजाति) और आदिवासी मजदूरों को उनकी आवासीय जमीन पर मालिकाना हक देने की ऐतिहासिक प्रक्रिया आज से शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने दिब्रूगढ़ के दिनजॉय टी एस्टेट में इसकी शुरुआत करते हुए आवेदन फॉर्म वितरित किए, जहां सैकड़ों चाय मजदूरों ने इस मौके को देखा।

यह कदम असम फिक्सेशन ऑफ सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स (अमेंडमेंट) एक्ट, 2025 के तहत उठाया गया है, जिसके जरिए चाय बागानों की लेबर लाइनों में स्थित घरों और जमीन का मालिकाना हक अब बागान मालिकों से हटाकर मजदूरों को सौंपा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने इसे “ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने वाला कदम” बताया और कहा कि 200 साल पुराने चाय उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को पहली बार अपनी जमीन का मालिक बनने का मौका मिल रहा है।

प्रक्रिया की शुरुआत और लक्ष्य

  • 103 चाय बागानों में सर्वे पूरा हो चुका है, जहां से फॉर्म भरने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
  • आज से ही 250 और बागानों में सर्वे शुरू हो गया है।
  • कुल मिलाकर असम के करीब 800 चाय बागानों में यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी।
  • लगभग 3.5 लाख परिवारों (करीब 5 लाख मजदूर परिवारों) को लाभ मिलने की उम्मीद है, जो राज्य की आबादी का लगभग 20% हिस्सा हैं।
  • इनमें ज्यादातर झारखंड, ओडिशा (उड़ीसा), छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से आए टी-ट्राइब्स शामिल हैं, जो ब्रिटिश काल से चाय बागानों में काम कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा, “पहले बागान मालिकों के पास जमीन का मालिकाना हक था, जबकि मजदूर सदियों से वहां रहते और काम करते आए हैं। कोई पिछली सरकार ने इस मांग को पूरा नहीं किया, लेकिन हमारी सरकार ने इसे प्राथमिकता दी। अब चाय श्रमिक अपनी जमीन के मालिक बनेंगे, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।”

फॉर्म में क्या भरना होगा?

मजदूरों को आवेदन फॉर्म में अपनी सही जानकारी, नाम, पता और जमीन किसके नाम पर आवंटित करनी है, यह निर्दिष्ट करना होगा। सर्वे के बाद पट्टे (लैंड टाइटल) जारी किए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य है कि चुनाव अधिसूचना से पहले कम से कम कुछ मजदूरों को पट्टे मिल जाएं, हालांकि पूरी प्रक्रिया में 6 से 12 महीने लग सकते हैं।

महत्वपूर्ण बातें

  • जमीन पट्टा मिलने के बाद कम से कम 10 साल तक बेची नहीं जा सकेगी।
  • यदि बेची भी जाए तो केवल अन्य चाय बागान मजदूरों को ही बेची जा सकेगी, बाहरी लोगों को नहीं।
  • यह कदम चाय मजदूरों को बेदखली के डर से मुक्ति दिलाएगा और उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा व भविष्य देगा।

यह फैसला चाय समुदाय के लिए एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन लाने वाला है। टी-ट्राइब्स के संगठनों और मजदूरों में इसकी खुशी का माहौल है, जबकि कुछ कानूनी चुनौतियां भी सामने आई हैं। असम सरकार इसे तेजी से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है।

 

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