Arvinder Singh Deol (Butter Deol), Ranchi
Educationist | Social Worker | Political Analyst | Career Counsellor

यह कहना न तो सही होगा और न ही ईमानदार कि भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कमजोर है। भारत ने पहले भी संकट झेले हैं, आज भी झेल रहा है और आगे भी झेलने की क्षमता (resilience) रखता है। लेकिन क्षमता होना और पूरी तरह स्वस्थ होना — ये दोनों बातें एक नहीं हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज आर्थिक बहस या तो अंधी आलोचना में फंसी है, या फिर अंधी भक्ति में — जहाँ हर सवाल को “नकारात्मकता” कहकर दबा दिया जाता है और हर चेतावनी को WhatsApp University के चमकदार फॉरवर्ड से ढक दिया जाता है।
जब अर्थव्यवस्था मजबूत हो, तो सरकार कमजोर क्यों दिखती है?
एक सचमुच मजबूत अर्थव्यवस्था सरकार को मज़बूत बनाती है। लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 कुछ और ही तस्वीर दिखाता है।
- 2019 में राज्यों का राजस्व घाटा GDP का 0.1% था
- 2025 में यह बढ़कर 0.7% हो गया
यह कोई तकनीकी आंकड़ा नहीं है। यह संकेत है कि राज्य सरकारें रोज़मर्रा के खर्च के लिए भी कर्ज़ पर निर्भर होती जा रही हैं। अगर अर्थव्यवस्था इतनी स्वस्थ है, तो सरकार की तिजोरी खाली क्यों हो रही है?
GDP बनाम आम आदमी: काग़ज़ पर तरक्की, ज़मीन पर तंगी
आर्थिक सर्वेक्षण खुद स्वीकार करता है कि सरकार की आय GDP की रफ्तार से पीछे चल रही है। इसका सीधा अर्थ है: विकास ऊपर दिख रहा है, नीचे महसूस नहीं हो रहा। GDP का बढ़ना अगर आम आदमी की आमदनी नहीं बढ़ा रहा, तो वह विकास नहीं — आंकड़ों की चमक है।
रोज़गार: सबसे ज़्यादा बोले जाने वाला, सबसे कम समझाया गया सच
रोज़गार पर सरकार बड़े दावे करती है, लेकिन यह साफ़ नहीं बताया जाता कि:
- कितनी नौकरियाँ स्थायी हैं
- कितनी नौकरियाँ सम्मानजनक जीवन दे पा रही हैं
आज का युवा पढ़ा-लिखा है, मेहनती है, फिर भी अस्थायी और असुरक्षित कामों में फंसा हुआ है। यह जनसांख्यिकीय लाभ नहीं, धीरे-धीरे जनसांख्यिकीय खतरा बनता जा रहा है।
महंगाई: आंकड़ों से ज्यादा अनुभव की सच्चाई
सरकार कहती है महंगाई “काबू में” है। लेकिन जब दूध, दाल, सब्ज़ी और दवा महंगी हों, तो यह बहस सैद्धांतिक नहीं रहती। आर्थिक सर्वेक्षण खुद मानता है कि महंगाई का असर अस्थायी नहीं, लंबे समय तक रहने वाला है। महंगाई कोई ग्राफ नहीं,
यह हर महीने का घरेलू बजट है।
विकास या राहत? आज का आराम, कल की परेशानी
सरकार ने नकद सहायता योजनाओं पर भारी खर्च किया है। राहत ज़रूरी हो सकती है, लेकिन जब उसी समय:
- उद्योग
- इंफ्रास्ट्रक्चर
- उत्पादन
पर निवेश सिमटता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या हम भविष्य बना रहे हैं, या सिर्फ आज को संभाल रहे हैं?
सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता
जब कोई सवाल उठाता है, तो उसे “नकारात्मक” या “देश-विरोधी” कह देना आसान है। लेकिन आर्थिक मजबूती का अर्थ सवालों से डरना नहीं होता। सच्ची मजबूती वही होती है जो आलोचना सह सके।
निष्कर्ष
भारत की अर्थव्यवस्था में दम है — इसमें संदेह नहीं, लेकिन दम होने का मतलब यह नहीं कि आंख बंद कर तालियाँ बजाई जाएँ। भक्ति और WhatsApp University की फॉरवर्ड हमें तसल्ली दे सकती हैं, समाधान नहीं।
आर्थिक सर्वेक्षण एक आईना है।
आईने से नज़र चुराने से चेहरा नहीं बदलता।
सवाल सिर्फ इतना है:
👉 क्या हम सच्चाई देखने का साहस रखते हैं?
