बोआरीजोर (गोड्डा), 13 जनवरी 2026
संताल आदिवासी समाज का सबसे प्रमुख और गौरवशाली पर्व सोहराय पूरे संथाल परगना में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस पर्व की तुलना अक्सर हाथी से की जाती है – विशाल, शक्तिशाली और समाज के लिए गर्व का प्रतीक। फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला यह उत्सव प्रकृति, पशुधन, पूर्वजों और समुदाय के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
इसी पावन अवसर पर प्रवासी भारतीय डॉ. धुनि सोरेन इंग्लैंड से अपने पैतृक गांव बोआरीजोर पहुंचे। डॉ. धुनि सोरेन संताल समाज के प्रथम “गोल्डन डॉक्टर” (FRCS) हैं, जो लिवरपूल (इंग्लैंड) में चिकित्सा सेवा दे रहे हैं। उन्होंने अपनी जड़ों से इतना गहरा लगाव रखा कि इंग्लैंड में बने अपने घर का नाम भी “बोआरीजोर” रखा।

गांव में हुआ जोरदार स्वागत
डॉ. धुनि सोरेन और उनकी धर्मपत्नी भगवती हेम्ब्रम के आगमन पर गांव की महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने पारंपरिक कुल्हि (गांव) में नृत्य-संगीत के साथ गर्मजोशी से स्वागत किया। मांझी थान में माथा टेककर पूजा-अर्चना के बाद वे ग्रामीणों के साथ सोहराय के पारंपरिक नाच-गान में शामिल हुए।ग्रामीणों में डॉ. धुनि सोरेन को देखकर विशेष उत्साह और खुशी छाई रही। सोहराय के पावन मौके पर डॉ. धुनि सोरेन ने गांव के जरूरतमंद ग्रामीणों के बीच कंबल वितरित किए, जिसकी सभी ने सराहना की। यह उनका नियमित प्रयास है कि दूर रहकर भी वे अपने समाज की मदद करते रहें। इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे: नारायण बेसरा प्राणिक, रोजमेरी मरांडी, बेटा सोरेन, संझला सोरेन, मूंशी सोरेन, शनिराम मुर्मू, बाबलु मरांडी, प्रेम मरांडी, बुधराम मुर्मू, दीलीप सोरेन, निलकमल सोरेन, ताला सोरेन, डुमका बास्की, लखन टुडू, डबलु सोरेन, निर्माल सोरेन, कीतल सोरेन, होपना सोरेन, राजकुमार सोरेन, बाबूजी सोरेन, अनिल मरांडी, ताला सोरेन, निर्मल सोरेन, जितेंद्र टुडू सहित महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा।

संतालों का सबसे प्रमुख त्यौहार है सोहराय
संताल आदिवासी समाज का सबसे प्रमुख और गौरवशाली पर्व सोहराय पूरे संथाल परगना में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस पर्व की तुलना अक्सर हाथी से की जाती है – विशाल, शक्तिशाली और समाज के लिए गर्व का प्रतीक। फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला यह उत्सव प्रकृति, पशुधन, पूर्वजों और समुदाय के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
डॉ. धुनि सोरेन ने इस अवसर पर कहा कि “हम सभी को अपनी संस्कृति, परंपरा और रीति-रिवाजों को सहेजकर रखना चाहिए। यही हमारी पहचान है और इस पर हमें गर्व होना चाहिए। सोहराय पर्व हमें भाईचारे, एकता और आपसी सहयोग का संदेश देता है।”

जन्म और प्रारंभिक जीवन
डॉ. धुनी सोरेन का जन्म 1935 में ब्रिटिश राज के दौरान (भारत की आजादी से 12 वर्ष पहले), झारखंड के गोड्डा जिले के बोआरीजोर गांव (तत्कालीन संथाल परगना, बिहार) में एक गरीब संताल परिवार में हुआ। वे बचपन में नंगे पैर गांव के स्कूल जाते थे। बोआरीजोर में मिडिल स्कूल तक नहीं था, इसलिए पैदल कई किलोमीटर चलकर पथरगामा और ठाकुरगंगटी में पढ़ाई की। उन्होंने दसवीं कक्षा दुमका जिला स्कूल से पास की। उच्च शिक्षा के लिए वे पटना गए, जहां पटना साइंस कॉलेज से जीव विज्ञान में स्नातक किया और फिर प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज (अब PMCH, पटना) से मेडिकल की डिग्री प्राप्त की।

इंग्लैंड की यात्रा और सफलता
1965 में डॉ. सोरेन FRCS (Fellowship of the Royal College of Surgeons) करने के लिए इंग्लैंड गए। वहां सफलता प्राप्त करने के बाद इंग्लैंड में ही बस गए और लिवरपूल (Liverpool) में चिकित्सा सेवा शुरू की। इंग्लैंड की नागरिकता ली और एक सफल डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस की (अब रिटायर्ड)। उनके पिता राम सोरेन परगनैत को भी स्थानीय समुदाय सेवा के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किये गये थे।
उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। जिसमें “History of Santals: A Brief Account” (संतालों का इतिहास) और “An Unlikely Tale of a Santal Villager in England” (एक संताल ग्रामीण की इंग्लैंड में अप्रत्याशित कहानी – उनकी आत्मकथा) है। उन्होंने संताल समुदाय की धार्मिक पुस्तक “जोमसिम विनती” का विमोचन किया।
डॉ. धुनि सोरेन का यह आगमन दिखाता है कि कितनी भी दूर क्यों न जाएं, जड़ें मजबूत रहती हैं।
