चाईबासा, 28 अक्टूबर 2025
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा शहर में भारी वाहनों के प्रवेश पर ‘नो-एंट्री’ लगाने की जायज मांग को लेकर आदिवासी-मूलवासी समुदाय का शांतिपूर्ण आंदोलन रात के अंधेरे में पुलिस की बर्बर कार्रवाई का शिकार हो गया। 27 अक्टूबर को ताम्बो चौक पर सैकड़ों ग्रामीणों ने धरना दिया, लेकिन शाम ढलते ही लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़कर प्रशासन ने इसे कुचलने की कोशिश की। महिलाओं और बच्चों तक पर हमले की घटना ने पूरे आदिवासी समाज में रोष भर दिया है। विपक्षी नेता बाबूलाल मरांडी और पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने इसे ‘आदिवासी-विरोधी साजिश’ करार देते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।

आंदोलन की पृष्ठभूमि: सड़क हादसों का खौफनाक सिलसिला
चाईबासा शहर और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में एनएच-20 और चाईबासा बाईपास पर दिन के समय भारी वाहनों (ट्रक, डंपर) की बेतहाशा आवाजाही से पिछले एक साल में दर्जनों सड़क दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें कई मासूम बच्चों और ग्रामीणों की जानें जा चुकी हैं। रुंगटा माइंस जैसी खनन कंपनियों के अवैध ढुलाई वाले वाहन मुख्य आरोपी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में दिन में भारी वाहनों पर नो-एंट्री का नियम लागू है, तो चाईबासा में क्यों नहीं?
27 अक्टूबर को सुबह से ही ताम्बो चौक पर सैकड़ों आदिवासी-हो समुदाय के लोग इकट्ठा हुए। वे परिवहन मंत्री दीपक बिरुआ (जो खुद आदिवासी हैं) के आवास का घेराव करने निकले थे। नारे लगाए गए, बैनर दिखाए गए, लेकिन दिन भर आंदोलन शांतिपूर्ण रहा। मांग स्पष्ट थी कि दिन में बड़े वाहनों पर पूर्ण प्रतिबंध, रात में ही आवाजाही।

घटना का क्रम: शांति से हिंसा तक
प्रदर्शनकारी जिला परिषद सदस्य माधव चंद्र कुंकल, सोना सवैया और समाजसेवी रमेश बालमुचू, रेयांश सामाड जैसे नेताओं के नेतृत्व में धरने पर बैठे। पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाई, लेकिन कोई झड़प नहीं हुई। आंदोलनकारी गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की भी मांग कर रहे थे, जो 25-26 अक्टूबर को ‘आंदोलन विफल करने’ के लिए हिरासत में लिए गए थे। दोपहर 3-4 बजे के आसपास ग्रामीण मंत्री आवास की ओर बढ़े। पुलिस ने रोकने की कोशिश की। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि प्रदर्शनकारियों ने सदर एसडीपीओ बाहमन टूटी की स्कॉर्पियो गाड़ी पर पथराव किया, जिससे वाहन क्षतिग्रस्त हो गया। इससे अफरा-तफरी मच गई। शाम 6-7 बजे से स्थिति बिगड़ी। रात 11:50 बजे के करीब, जब प्रदर्शन थमने लगा, पुलिस ने अचानक लाठीचार्ज शुरू कर दिया। आंसू गैस के गोले छोड़े गए, फायरिंग की भी खबरें हैं। महिलाओं और बच्चों पर हमले की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “दिन भर शांतिपूर्ण धरना था, रात के अंधेरे में कैसे उग्र हुए? यह प्रशासन की नाकामी छुपाने की साजिश है।” पुलिस ने धारा 144 लागू कर दी और कई आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज कर जेल भेज दिया है।

आंदोलन थमने को तैयार नहीं
28 अक्टूबर सुबह तक ताम्बो चौक पर धरना जारी है। ग्रामीणों ने अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी दी है। राज्य सरकार या मंत्री के स्तर पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। सोशल मीडिया पर वीडियो और फोटो वायरल हैं, जो धुएं, भागते लोगों और घायलों की तस्वीरें दिखा रहे हैं। यह घटना न सिर्फ सड़क सुरक्षा का मुद्दा उठाती है, बल्कि झारखंड में आदिवासी अधिकारों पर सवाल भी खड़े करती है। भोगनाडीह, नगड़ी जैसे पिछले मामलों के बाद यह तीसरा बड़ा दमन। यदि मांगें पूरी न हुईं, तो कोल्हान क्षेत्र में आंदोलन तेज हो सकता है। विपक्षी दल बीजेपी इस मामले को लेकर मुखर है। घाटशिला विधानसभा उपचुनाव के प्रचार में जुटे चंपाई सोरेन ने इसे सरकार के बर्बर कार्रवाई का एक नमूना बताया है। वंही नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी घटना की निंदा की है। कई सामाजिक संगठनों ने भी घटना पर अपनी चिंता और विरोध जताया है।
